बिहार में शराबबंदी: युवाओं की गिरफ्तारी, पुलिस की भागदौड़ में मौतें और जुर्माने का सच (2014-2025)
बिहार में शराबबंदी एक ऐसा मुद्दा रहा है, जो पिछले एक दशक से चर्चा में बना हुआ है। 5 अप्रैल 2016 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी, जिसके तहत शराब की बिक्री, खरीद, और सेवन पर सख्त प्रतिबंध लगाया गया। यह कदम सामाजिक सुधार और स्वास्थ्य सुधार के लिए उठाया गया था, लेकिन इसके परिणामस्वरूप कई सवाल भी उठे। खासकर युवाओं की गिरफ्तारी, पुलिस की कार्रवाइयों में होने वाली मौतें, और जुर्माने की राशि ने इस नीति को विवादों के घेरे में ला दिया। इस ब्लॉग में हम 2014 से 2025 (वर्तमान तारीख 18 मार्च 2025 तक) के आंकड़ों और घटनाओं के आधार पर इस मुद्दे की गहराई में जाएंगे।
शराबबंदी का उद्देश्य और शुरुआत
बिहार में शराबबंदी की नीति का मकसद था नशे की लत से लोगों को मुक्त करना, घरेलू हिंसा को कम करना, और समाज में सकारात्मक बदलाव लाना। नीतीश सरकार ने इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया। लेकिन इस नीति के लागू होने के बाद अवैध शराब का कारोबार बढ़ा, जिसके चलते युवाओं की जिंदगी पर गहरा असर पड़ा। शराब बेचने और पीने के आरोप में हजारों युवा जेल की सलाखों के पीछे पहुंचे, कई पुलिस की भागदौड़ में मारे गए, और लाखों रुपये जुर्माने के रूप में वसूले गए।
युवाओं की गिरफ्तारी: आंकड़ों का विश्लेषण
2016 से शराबबंदी लागू होने के बाद बिहार में गिरफ्तारियों की संख्या तेजी से बढ़ी। उत्पाद विभाग और पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2016 से सितंबर 2024 तक 8.43 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए और 12 लाख से ज्यादा लोग गिरफ्तार हुए। इसमें बड़ी संख्या युवाओं की थी, खासकर 18 से 35 साल की उम्र के लोग।
2014 – 2016 ( शराबबंदी से पहले ) : उस समय मे शराब से जुड़े अपराध कम थे , क्योंकी यह कानूनी रूप से उपलब्ध थी | लेकिन अवैध शराब की बिक्री के मामले मे करीब 10,000 लोग गिरफ्तार हुए थे |
. 2016 – 2025 ( शराबबंदी के बाद )शराबबंदी लागूहोने के बाद स्थिति बदल गई। 2018 तक ही 1.61 लाख लोग गिरफ्तार हुए थे, और 2024 तक यह संख्या 12 लाख को पार कर गई। अनुमान है कि इसमें से 60-70% युवा थे, जो या तो शराब बेचने या पीने के आरोप में पकड़े गए। यानी करीब 7-8 लाख युवा जेल की हवा खा चुके हैं।
युवाओं की इतनी बड़ी संख्या में गिरफ्तारी ने कई सवाल खड़े किए। क्या यह नीति अपराध को रोक रही है या नए अपराधियों को जन्म दे रही है? कई युवा छोटे-मोटे पैसे के लिए शराब बेचने के धंधे में शामिल हुए, और सख्त कानून के चलते उनकी जिंदगी बर्बाद हो गई।
जुर्माने का बोझ: कितना वसूला गया?
बिहार में शराबबंदी
यूपीशराबबंदी कानून के तहत पहली बार पकड़े जाने पर जुर्माना और सजा का प्रावधान है। 2016 के कानून के मुताबिक, शराब पीने या बेचने पर 1 लाख से 10 लाख रुपये तक का जुर्माना और 10 साल तक की सजा हो सकती है।
- आंकड़े: 2016 से 2022 तक 2.09 करोड़ लीटर शराब जब्त की गई और 4.45 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसमें से कई मामलों में जुर्माना वसूला गया। अनुमान है कि 2016 से 2025 तक करीब 500-700 करोड़ रुपये जुर्माने के रूप में वसूले गए।
- युवाओं पर असर: युवाओं के लिए यह जुर्माना चुकाना मुश्किल होता है। कई परिवार कर्ज में डूब गए, और कुछ मामलों में युवाओं को जेल की सजा काटनी पड़ी। 2022 में अक्टूबर महीने में ही 20,000 लोग पकड़े गए, जिनमें से कई ने जुर्माना भरा।
जुर्माने की यह राशि सरकार के खजाने में जाती है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा गरीब और युवा परिवारों की जेब से निकलता है, जो इस नीति का सबसे ज्यादा शिकार बने।
शराबबंदी की हकीकत: युवाओं का भविष्य खतरे में
शराबबंदी के बावजूद बिहार में शराब का धंधा फल-फूल रहा है। हरियाणा, झारखंड, और उत्तर प्रदेश से शराब की तस्करी हो रही है, और गांव-गांव तक यह पहुंच रही है। युवा इस धंधे में इसलिए शामिल हो रहे हैं, क्योंकि यह मुनाफे का आसान जरिया बन गया है। लेकिन इसका खामियाजा उन्हें जेल, मौत, या आर्थिक बोझ के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
- सामाजिक प्रभाव: जेल से लौटने वाले युवाओं को समाज में सम्मान नहीं मिलता। उनकी नौकरी और शादी की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं।
- आर्थिक प्रभाव: जुर्माना और कानूनी खर्चे परिवारों को कंगाल कर रहे हैं। कई युवा दोबारा अपराध की राह पर चल पड़ते हैं।
सरकार और समाज की जिम्मेदारी
शराबबंदी को सफल बनाने के लिए सरकार को सख्ती के साथ-साथ जागरूकता और रोजगार के अवसरों पर ध्यान देना होगा। युवाओं को अपराध की राह से रोकने के लिए वैकल्पिक रास्ते चाहिए। पुलिस की कार्रवाइयों में पारदर्शिता और जवाबदेही भी जरूरी है, ताकि निर्दोष लोग न फंसें और असली अपराधियों पर नकेल कसी जा सके।
निष्कर्ष
बिहार में शराबबंदी ने युवाओं की जिंदगी को कई तरह से प्रभावित किया है। 2014 से 2025 तक लाखों युवा जेल गए, दर्जनों पुलिस की भागदौड़ में मारे गए, और करोड़ों रुपये जुर्माने में वसूले गए। यह नीति कितनी सफल रही, यह बहस का विषय है। लेकिन एक बात साफ है—जब तक अवैध शराब का कारोबार खत्म नहीं होगा, न तो मौतें रुकेंगी, न गिरफ्तारियां, और न ही जुर्माने का सिलसिला। युवाओं के भविष्य को बचाने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने होंगे।

